अयोध्या का कलंक।

 त्रेता युग में भरत खंड के सरयू नदी के तट पर अयोध्या नाम का एक राज्य था। जिसके बारे में वाल्मीकि, तुलसी जैसे महान विद्वानों ने लिखा है। इस नगर की विशेषता ये थी कि यह धर्म सर्वोपरि माना जाता था, विशेष करके राज्य धर्म। वचनों को गंभीरता से लिया जाता था। इस नगर में महान राजकुमार हुए, राम, जिन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कहा गया। राम  जब अपने गुरु महर्षि विश्वामित्र के साथ जनकपुर गये थे तो वहां पुष्पवटिका में उनकी दृष्टि जनक कुमारी सीता पर गई। राम सीता को देख कर मोहित हो गए। इस घटना पर तुलसीदास लिखते हैं 'देखि सीय शोभा सुखु पावा। हृदयँ सराहत बचनु न आवा॥ जनु बिरंचि सब निज निपुनाई। बिरचि बिस्व कहँ प्रगटि देखाई॥'उसी समय जनकसुता का स्वयंवर भी आयोजित था। राजा जनक का संकल्प था कि जो भी शिव धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाएगा, सीता का विवाह उनके साथ ही होगा। जब शिव धनुष कोई न तोड़ सका तो राजा जनक के आवाहन पर, गुरु विश्वामित्र का आदेश पा राम ने शिव धनुष तोड़ा। स्वर्ग से देवताओं, गंधर्वों आदि ने पुष्प वर्षा की और राम सिया का विवाह संपन्न हुआ



लेकिन सीता के लिए समय की नियति कुछ और ही थी। राम जब अयोध्या लौटे और उनके राजाभिषेक की तैयारी होने लगी तो माता कैकई ने दशरथ को वचन याद दिलाते हुए राम के लिए चौदह वर्षों का वनवास और भरत के लिए राजसिंहासन । उस दिन अयोध्या के लिए सब कुछ बदलने वाला था। कैकई पुत्र मोह में अडिग थीं, दशरथ वचन से बंधे थे, राम पिता के आदेश से, लक्ष्मण भ्राता प्रेम से और सिया पत्नी धर्म में। राम, लक्ष्मण और सीता के साथ वनगमन कर गए। जब ये सूचना भरत को मिली तो वो राम के चरण पादुका को सिंघासन पर रख राज्य चलाया। ऐसा लगता है मानो सबने एक धर्म को माना और दूसरे का त्याग कर दिया। पर सीता अपने धर्म पर अडिग रहीं। वनवास में राम और लक्ष्मण के संरक्षण में रहते हुए भी रावण ने सीता का हरण कर लिया। सीता वहां भी अपने पतिव्रत पर अडिग रहीं। जब रावण वध करके सीता वापस आईं, तो अग्नि परीक्षा देकर अपनी पवित्रता को सिद्ध किया। परन्तु फिर भी जब सीता के बारे अयोध्या के लोगों ने लांछन लगाए, राम ने सिया का त्याग कर दिया। राम ने भी एक धर्म को ऊपर रख दूसरे धर्म का त्याग किया। सिया को पुनः वन में जान पड़ा और अंततः वह पुनः भूमि में समा गई। इन सब के बीच कहीं तो सीता का हृदय द्रवित तो हुआ ही होगा। शायद उनके मन का ही वो दुख है जिसने अयोध्या को हमेशा ही कलंकित रखा। सबसे पहले तो सिया का सम्मान न करने का कलंक, मर्यादा पुरुषोत्तम राम पर संदेह का कलंक,कैकई पर  लंबे समय तक राम के जन्मस्थान पर मालेच्छो का अतिक्रमण रहा। सुंदर भवन को तोड़ दिया गया। स्वयं राम लाल को एक तंबू में रहना पड़ा। लेकिन समय का क्या है, बदला। रामलला को उनका घर वापस मिला। पूरे भारतवर्ष के लोगों ने स्वर्ण, रजत और धन देकर राम के भवन का निर्माण किया। लेकिन जिस अयोध्या की प्रजा ने सिया को कलंकित किया था, वो कलंक लौटकर वापस आया। रामलला के भवन बनाने वालों और उनकी सुरक्षा करने वालों पर ही धन की चोरी का कलंक लगा। पूरा जीवन रामलला पे न्योछावर करने वाला ही चोरी के आरोपों से घिर गया। जिन लोगों को सम्मान से देखा जाता था, उन पर लांछन लगे। लोगो की श्रद्धा भी डगमगाई। ये चोरी कितना सत्य कितना झूठ, राम ही जाने। लेकिन अयोध्या के माथे पर कलंक आज भी है।