दुनियाँ बनाने वाले.....


प्रसिद्ध गायक मुकेश जी का आज जन्मदिन है। वो मेरे सबसे प्रिय है और घंटों मैं उनके गाए गीत सुनता रहता हूँ। आज भी कुछ गाने सुनते हुए मुझे अपने बचपन कि कुछ बाते याद आई तो सोचा लिखूँ|

मुकेश को सुनना मैंने कब शुरू किया ये तो ठीक से याद नही, पर एक घटना है जिसने मुकेश से मुझे हमेशा के लिए जोड़ दिया। तब शायद मैं 5th क्लास में था। पापा ने मुझे एक वॉकमेन खरीद के दिया हुआ था। आज वाले डिजिटल वॉकमेन नही, वो जो रील-कैसेट  वाले होते थे न वो, वो भी असली सोनी वाला नही, चाइना वाला ;-) । पूरे दिन बैठ कर मैं गाने सुना करता था, और एक ही कैसेट को न जाने कितनी बार सुनता था। कारण ये था कि नए कैसेट बहुत महंगे आते थे, कम से कम मेरे लिए तो महंगे ही थे। पर उसका जुगाड़ भी हमारे नजदीकी कैसेट वालो ने ढूंढ लिया था।  बस २० रूपये दो और किसी भी कैसेट का नकली कॉपी बनवा लो। पर २० रूपये जमा करने में २० दिन लगते थे साहब,वो भी रोज़ का स्कूल जाने से पहले मिलने वाला 1 रुपया बचा कर। तो पहला कैसेट जो मैंने जाकर कॉपी बनवाया था उसका टाइटल था 'मुकेश के दर्द भरे नगमे' । दर्द तो उस समय नही समझ आता था पर कैसेट का साइड A  में पहला गाना था ' पत्थर के सनम तुझे हमने मोहब्बत का खुदा माना'। ऐसे ही कई गाने थे। मुझे मुकेश साहब कि आवाज सबसे अलग और अच्छी लगी। उस कैसेट में मेरा फेवरिट गाना था साइड बी का तीसरा गाना' दुनिया बनाने वाले क्या तेरे मन में समाई' ।अब के नए बच्चे जिन्हे साइड के बारे में नही पता उन्हें बता दूँ कि कैसेट के दो साइड होते थे, A  और B  और दोनों साइड में अगल-अलग 5-6 गाने होते थे।अब ये एक ही रील के अलग साइड में अलग गाने कैसे समाते थे ये हमको अब भी नहीं पता । किसी खास गाने तक पहुंचने के लिए उस साइड के रील को ऊँगली से घुमा कर वहां पहुंचना पड़ता था। मुझे 'दुनिया बनाने वाले' गाने तक पहुंचने के लिए exactly कितना रील घूमाना पड़ेगा पता था। इस कैसेट की रील अकसर उसी जगह पे मैं रखा करता था, क्योकि पूरे केसेट में यही गाना समझ भी आता था।
उसी बीच हम कभी अपने गाँव गए। उस समय तक मेरी परदादी जीवित थीं । उन्हें हम बुढ़िया दादी कहते थे। उनसे ज्यादा प्यार हम सब को पूरी दुनिया में शायद कोई नही करता था।  उनकी सुनाई कुछ कहानी मुझे आज तक याद है। उनके छोटे बेटे यानी कि मेरे छोटे दादा जी भी लुधियाना ही रहते थे। पर वो गाँव बहुत कम जाते थे।मेरी बुढ़िया दादी उनको बहुत याद करती थी। फोन उस समय आम नही था।एक   दिन की बात है मेरे पापा बुढ़िया दादी के साथ बैठे थे और बुढ़िया दादी अपने छोटे बेटे को याद करने लगी और पापा से कहने लगी कि उनकी बात एक चिट्ठी में लिख ले और मेरे छोटे दादा जी को देदे। न जाने पापा को क्या सूझा। उन्होंने मेरा वॉकमेन उठाया और उन्हें बोला कि जो भी कहना है कह दें वो उनकी आवाज में ही खत उनके छोटे बेटे को सुना देंगे और उन्होंने रिकॉर्डिंग स्टार्ट कर दी। उस समय भी वॉकमेन में रिकॉर्डिंग होता था पर लगे कैसेट का गीत उड़ जाय करता था मतलब डिलीट हो जाया करता था। और मेरा सबसे पसंदीदा गीत उड़ चुका था और मुकेश कि आवाज कि जगह मेरी बुढ़िया दादी के आवाज ने ले लिया था। जब मुझे ये पता चला तो बहुत गुस्सा आया। पर कर भी क्या सकते थे।हम वापस लुधियाना आ गए। मेरे छोटे दादा जी को वो रिकॉर्डिंग सुनाया गया, उन्हें बहुत दुःख हुआ। पर इससे पहले कि वो अपना काम-काज किसी और के जिम्मे देकर गाँव उनसे मिलने जाते, उससे पहले ही मेरी बुढ़िया दादी का हमें सदा के लिए छोड़ जाने का खबर हम सब को  मिल गया।  ज़िन्दगी के भाग दौर में लगा एक बेटा अंतिम समय में अपनी बूढी माँ से ना मिल पाया और एक माँ अपने बेटे का इंतज़ार करते हुए इस संसार को अलविदा कह गईं। बुढ़िया दादी के चले जाने के बाद भी उनकी रिकॉर्ड की गई बातें उस कैसेट में लम्बे समय तक रही। हम सब अक्सर उनकी आवाज को सुना करते थे।
भूख मिटाने और कुछ बेहतर पाने के लिए ना जाने कितने लोग अपने परिवारों से आज भी दूर हैं।और ये सब देख कर, सोच कर मुझे आज भी यही पंक्तियाँ दिमाग में आती है
दुनियाँ बनाने वाले, क्या तेरे मन में समायी
काहे को दुनियाँ बनायी, तूने काहे को दुनियाँ बनायी..........


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©Kunal Jha